अध्याय 4: जुनून की दूसरी लहर
अब बंसरी ने रोहन को अपने दोनों हाथों में जकड़कर गहरा, लंबा, लगभग अनंत किस लिया। उसके नरम, गुलाबी होंठ रोहन के होंठों पर इस कदर दब गए कि जैसे दोनों एक-दूसरे में घुल-मिल जाना चाहते हों। उसकी जीभ रोहन की जीभ से लिपट गई, नाचने लगी – कभी तेज़ी से घुमाते हुए, कभी धीरे-धीरे चाटते हुए, कभी उसकी जीभ को अपने मुँह में खींचकर चूसते हुए। किस के बीच में ही बंसरी ने अपनी गर्म, कामुक साँसें रोहन के मुँह में फूँकते हुए फुसफुसाया, स्वर इतना मीठा और इतना भूखा कि रोहन की रीढ़ की हड्डी में करंट-सा दौड़ गया –
“डार्लिंग… मेरे प्यारे राजा… अब दूसरा राउंड शुरू करते हैं… और इस बार मैं तुम्हें वो सुख दूँगी, वो आनंद दूँगी, जिसकी तुमने कभी कल्पना भी नहीं की होगी… आज रात तू सिर्फ़ मेरा राजा नहीं, मेरा गुलाम भी है… मेरा आज्ञाकारी, मेरा समर्पित गुलाम… और मैं तेरी रानी… तेरी मल्लिका… तेरी क्वीन… जो भी तू चाहे, जो भी तू माँगे… मैं सब कुछ दूँगी… सब कुछ… बस तू मेरा होकर रह जा… पूरी रात… पूरी तरह… मेरे अधीन…”
बंसरी ने रोहन को पलंग के ठीक बीचों-बीच लिटाया, उसके शरीर को दोनों हाथों से दबाकर, जैसे कोई बहुमूल्य खिलौना हो जिसे वह बार-बार अपने हिसाब से सजाना चाहती हो। उसने दो मोटे, रेशमी, मुलायम तकिए उठाए – और उन्हें रोहन के सिर के नीचे बड़ी नाज़ुकता से, लगभग पूजनीय भाव से रखा। रोहन का सिर अब थोड़ा ऊँचा था, जिससे वह बंसरी के हर भाव, हर हरकत, हर पलक झपकने, हर साँस लेने को बिल्कुल पास से, बिना किसी कोण से छूटे देख सकता था। बंसरी की आँखों में शरारत की चिंगारी, प्यार का समंदर और भूख का ज्वालामुखी – तीनों का अनोखा, उत्तेजक मिश्रण था। उसकी आँखें रोहन की आँखों में घुसकर कह रही थीं – “आज तू मेरे काबू में है… और मैं तुझे छोड़ने वाली नहीं…”
फिर उसने रोहन की दोनों टाँगों को धीरे-धीरे, बहुत ही संभालकर, लगभग प्रेमपूर्वक अपने हाथों में लिया। उसने रोहन की टाँगों को हवा में ऊपर उठाया, घुटनों से मोड़ा और उन्हें पूरी तरह, जितना हो सके उतना फैला दिया। जैसे ही टाँगें पूरी तरह खुलीं, रोहन का लंड, अंडकोष और पूरा निचला हिस्सा पूरी तरह उजागर, नंगा और बेसहारा हो गया। रोहन के मुँह से दर्द और उत्तेजना की मिली-जुली, गहरी चीख निकली –
“आह्ह्ह्ह्ह… डार्लिंग… बहुत दर्द हो रहा है… आह्ह्ह… मेरी जाँघें… जाँघों की नसें… फट जाएँगी… उफ्फ़्फ़… इतना खींचा है… लेकिन… लेकिन फिर भी… कितना अच्छा लग रहा है… तुम्हारे हाथों में इस तरह खुला होना…”
बंसरी ने खिलखिलाकर हँसते हुए, अपनी हँसी में घंटियों-सी झंकार भरते हुए, उसके गाल पर हल्का, चिकना चुंबन लिया। उसके होंठ गाल पर लगते ही रोहन की त्वचा पर एक रोमांच-सी लहर दौड़ गई।
“मजे के लिए दर्द तो सहन करना ही पड़ता है ना, मेरे राजा… मेरे प्यारे, मासूम पति… थोड़ा दर्द, बहुत-बहुत-बहुत मज़ा… ये तो बस शुरुआत है, मेरी जान… आगे जो आने वाला है, वो तुम्हें पागल कर देगा… तुम्हें चीख-चीखकर मेरी माँग करवाएगा… तुम रोओगे, गिड़गिड़ाओगे, फिर भी और माँगोगे… बोलो… तैयार हो ना मेरे लिए?”
रोहन ने उसकी बात सुनकर शर्माते हुए, चेहरे पर लालिमा फैलाते हुए मुस्कुराया। उसकी आँखें झुक गईं, लेकिन होंठों पर मुस्कान थी। उसने अपने दोनों हाथों से अपनी टाँगों को खुद पकड़ लिया – उँगलियाँ जाँघों पर कस गईं – ताकि बंसरी को पूरी आसानी हो, कोई रुकावट न आए। अब वह पूरी तरह खुला, नंगा, बेसहारा और समर्पित था – जैसे कोई बलि का पशु, लेकिन इस बलि में सिर्फ़ आनंद था, सिर्फ़ सुख था, सिर्फ़ बंसरी का प्रेम और जुनून था। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, साँसें तेज़ हो रही थीं।
बंसरी ने धीरे से अपना सिर नीचे किया। उसकी लंबी, घनी, काली, रेशमी लटें रोहन की जाँघों पर बिखर गईं, जैसे काली रेशम की चादर फैल गई हो। उसकी मादक गंध – रोहन की नाक तक पहुँच रही थी। उसने रोहन के लंड को अपनी नरम, गर्म, लंबी उँगलियों में थामा – उँगलियाँ लंड के चारों तरफ़ लिपट गईं, हल्का दबाव दिया। लंड अभी पूरी तरह खड़ा नहीं हुआ था, लेकिन उसकी नसें फड़क रही थीं, सुपाड़ा हल्का सा सूजा हुआ था, उस पर हल्की नमी चमक रही थी। बंसरी ने अपनी गर्म, नम साँसें उसके सुपाड़े पर फेंकीं – एक-एक साँस में उत्तेजना भरते हुए – फिर अपनी जीभ बाहर निकाली, गुलाबी, चिकनी, लंबी जीभ।
पहले तो सिर्फ़ जीभ की नोक से सुपाड़े के चारों तरफ़ गोल-गोल, बहुत धीरे-धीरे, लगभग यातना देते हुए घुमाया। फिर अचानक पूरा लंड अपने मुँह में ले लिया – गर्म, नम, चिकना, और बहुत गहरा मुँह। वह तेज़-तेज़ सिर हिलाने लगी – ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे, पूरी गति के साथ। कभी पूरा लंड जड़ तक ले लेती, लंड उसके गले तक पहुँचकर फड़कता, फिर बाहर निकालकर सिर्फ़ सुपाड़े को चूसती – ज़ोर-ज़ोर से, आवाज़ निकालते हुए। उसकी जीभ लंड की हर नस पर नाच रही थी, कभी दाँतों से हल्का-हल्का, बहुत नाज़ुकता से काटती, फिर तुरंत जीभ से सहलाकर, चाटकर, दर्द को मिठास में, आग को शहद में बदल देती। लंड पर उसका थूक चमकने लगा था – चमकदार, रेशम सा, लंबी-लंबी धारियाँ बनाते हुए।
रोहन के मुँह से अनियंत्रित, बेकाबू सिसकारियाँ निकलने लगीं –
“उफ्फ्फ़्फ़… आह्ह्ह्ह… बंसरी… ओह्ह्ह माँ… कितना गर्म… कितना गीला… सिस्स्स्स… चूसो… और तेज़… और गहरा… आह्ह्ह्हह… मैं मर रहा हूँ… हाँ… हाँ… ठीक वहाँ… जीभ घुमाओ… उफ्फ़… तुम्हारी जीभ… जादू है… सिस्स्स्स… मैं तुम्हारा गुलाम हूँ… हमेशा का…”
उसकी सिसकारियाँ कभी लंबी और गहरी, गले से निकलती हुई, कभी छोटी-छोटी और काँपती हुई, कभी रोते हुए-से। कमरे की दीवारों से टकराकर, छत से टकराकर, चारों तरफ़ गूँज रही थीं – जैसे पूरा कमरा उनके जुनून की गवाही दे रहा हो।
दो मिनट तक इस तेज़, लगातार, गहरी, बिना रुके चूसाई के बाद बंसरी को महसूस हुआ कि रोहन का लंड अब पूरी तरह तैयार है – लोहे की छड़ सा सख्त, नसें फूली हुईं, सुपाड़ा चमकदार, लाल और फटा पड़ रहा था।
वह पलंग से नीचे उतरी। रोहन की पजामी के पास पड़ा कंडोम का पैकेट उठाया। पैकेट को दाँतों से फाड़ा – “चट्” की आवाज़ आई – कंडोम निकाला, उसे अपनी उँगलियों पर चढ़ाया, बहुत ही कुशलता से, और फिर पलंग पर चढ़ गई। उसने रोहन की टाँगों को सीधा किया, एक परफ़ेक्ट 90 डिग्री एंगल में लाया – जाँघें अब भी थोड़ी काँप रही थीं। फिर बिना एक पल भी रुके, कंडोम चढ़ाकर सीधी काउगर्ल पोज़िशन में बैठ गई – उसकी चूत रोहन के लंड के ठीक ऊपर।
एक झटके में… बिना किसी रुकावट के… बिना किसी हिचक के… रोहन का पूरा, सख्त, लंड उसकी गीली, गरम, रसीली, भरी चूत में समा गया।
“आह्ह्ह्ह…” रोहन के मुँह से एक गहरी, लंबी, आत्मा तक पहुँचने वाली सिसकारी निकली।
बंसरी ने तुरंत रोहन के दोनों हाथों को अपनी उँगलियों में कसकर फँसा लिया – उँगलियाँ एक-दूसरे में गूँथ गईं। उसकी कमर अब धीरे-धीरे ऊपर-नीचे होने लगी। पहले धीमी गति, लगभग यातना देते हुए, फिर तेज़, फिर और तेज़, फिर बेकाबू तेज़। पूरा लंड बाहर निकलता, सिर्फ़ सुपाड़ा अंदर रह जाता, फिर एक ज़ोरदार झटके में पूरा गहराई तक, जड़ तक धँस जाता। हर बार “पच… पच… पच… पच…” की गीली, कामुक, चिपचिपाती आवाज़ कमरे में गूँज रही थी। बंसरी की चूत का रस कंडोम पर चमक रहा था, उसकी जाँघों पर बह रहा था, रोहन की जाँघों पर टपक रहा था।
रोहन की सिसकारियाँ अब बेकाबू हो गईं –
“आह्ह्ह्ह… बंसरी… बहुत तेज़… उफ्फ़्फ़… मैं मर जाऊँगा… सिस्स्स्स… हाँ… और… और गहरी… ओह्ह्ह… तुम्हारी चूत… स्वर्ग है… नरक है… दोनों है… आह्ह्ह्ह… मुझे मार डालोगी… लेकिन… लेकिन मत रुकना… कभी मत रुकना…”
बंसरी सिर्फ़ मुस्कुराती हुई, आँखें बंद किए, होंठ काटते हुए, हाँ में सिर हिलाती हुई, अपनी गति बनाए रखे हुए थी। उसके लिए यह नॉर्मल था, लेकिन रोहन के लिए तो यह किसी परीलोक से भी बढ़कर, किसी स्वर्ग से भी ऊपर था। तीन मिनट तक लगातार इस तेज़, लगातार, गहरी, बिना थके पंपिंग के बाद बंसरी अचानक रुक गई। वह जानती थी कि रोहन ने दवाई खाई है, लेकिन वह अभी इतना उत्तेजित था कि ज़्यादा देर नहीं रुक पाता।
वह बिना लंड निकाले उसके सीने से चिपक गई। दोनों की छातियाँ एक-दूसरे से पूरी तरह दब गईं – बंसरी के भरे-भरे स्तन रोहन की छाती पर दबकर चपटे हो गए। बंसरी ने रोहन को लगातार गहरे, लंबे, जीभ वाली, लार बहाती किस करने शुरू कर दिए – कभी उसके निचले होंठ को चूसती, कभी ऊपरी को, कभी जीभ को काटती। रोहन की कमर हिल-हिलकर छोटे-छोटे झटके मार रही थी, लेकिन पूरा झड़ने के लिए पर्याप्त नहीं।
दो मिनट तक लगातार किस करने के बाद बंसरी को महसूस हुआ कि रोहन का शरीर अब पूरी तरह शांत हो चुका है, उत्तेजना थोड़ी ठंडी पड़ गई है। अब वह नहीं झड़ेगा।
तो उसने फिर से कमर हिलानी शुरू कर दी – इस बार और ज़ोर से, और गहरी। इस बार उसने रोहन के दोनों हाथ छोड़ दिए। फिर उसने रोहन के दोनों हाथ अपने गद्देदार, मक्खन जैसे, 35 इंच के नितंबों पर रख दिया, और अपने दोनों हाथ उसके सर के पास रख दिए। अब उसके 32 इंच के गोल, भरे-भरे, दूधिया, भारी स्तन रोहन के चेहरे के ठीक सामने झूल रहे थे – निप्पल सख्त, गुलाबी, आमंत्रित करते हुए।
रोहन पागल हो गया। वह बड़े प्यार से, भूखे जानवर की तरह, प्यासे शेर की तरह बारी-बारी से दोनों निप्पल चूसने लगा – कभी ज़ोर से मुंह में भरकर, पूरे निप्पल को चूसते हुए, कभी हल्के से चुसकर, जीभ से घुमाते हुए। उसके हाथ बंसरी के नितंबों पर घूम रहे थे – दबा रहे थे, मल रहे थे। बीच-बीच में उसकी उँगलियाँ डरते-डरते, काँपते हुए बंसरी के गांड के छेद के पास पहुँच जातीं, हल्का स्पर्श करतीं, फिर डरकर वापस खींच लेतीं।
बंसरी हाँफते हुए, कामुक स्वर में, स्वर को और भी भारी, और भी गीला बनाते हुए बोली,
“हाँ… चूसो… और ज़ोर से… मेरे राजा… जितना मन करे चूसो… इन स्तनों को चूसो… ये स्तन सिर्फ़ तुम्हारे हैं… तुम्हारी बीवी सिर्फ़ तुम्हारी है… तुम्हारी रानी… तुम्हारी क्वीन… जितना मज़ा लेना है ले लो… आह्ह्ह… हाँ… वहाँ… ठीक वहाँ… चूसो निप्पल को… उफ्फ़… तुम्हारे मुँह में कितना अच्छा लगता है… चूसो और तेज़… मैं तुम्हारी हूँ… पूरी तरह… आज रात और हर रात…”
रोहन बस सिसकारियों के बीच, निप्पल मुँह में भरे हुए, कह रहा था,
“आह्ह्ह… बंसरी… तुम स्वर्ग हो… सिस्स्स… तुम्हारी चूत… तुम्हारे स्तन… तुम्हारा बदन… तुम्हारी गर्मी… सब कुछ… मैं कभी नहीं भूल पाऊँगा… उफ्फ़… तुम्हारी गर्मी मुझे जला रही है… मैं तुम्हारा गुलाम हूँ… हमेशा… हमेशा…”
सात मिनट तक इस तेज़, लगातार, गहरी, स्तनों की चुसाई और चुदाई के बाद बंसरी फिर रुक गई। वह नहीं चाहती थी कि रोहन अभी झड़ जाए। वह फिर उसके ऊपर लेट गई और गहरे, लंबे, बिना रुके किस करने लगी – इस बार और गहरे, और भूखे।
तीन मिनट बाद वह उठी। लंड अभी भी पूरी तरह अंदर था। उसने धीरे-धीरे उल्टा होकर रिवर्स काउगर्ल पोज़िशन ले ली। अब उसकी पूरी पीठ, कमर की गहराई, और भरा-भरा चूतड़ रोहन के सामने था – चमकदार, हल्का पसीने से तर, आमंत्रित।
उसने रोहन का एक हाथ उठाया, उसकी एक उँगली अपने मुँह में ली, बहुत सारा, गर्म, लार भरा थूक लगाया – जीभ से चाट-चाटकर पूरी उँगली चिकनी कर दी। फिर झुककर अपने दूसरे हाथ से एक नितंब को हल्का सा सरका दिया।
रोहन के सामने बंसरी का गांड का छेद पूरी तरह साफ़, गुलाबी, कोमल, छोटा-सा, चमकदार दिखाई देने लगा – सिकुड़ता हुआ, जैसे साँस ले रहा हो।
उँगली पर लगा थूक गांड के छेद पर लगने लगा। रोहन की साँसें रुक गईं। उसने धीरे-धीरे उँगली फेरनी शुरू कर दी – घेरा-घेरा, बहुत नाज़ुकता से।
“रंडी बंसरी… तेरी गांड का छेद तो बहुत कोमल है… बहुत प्यारा है… बहुत…”
जैसे ही शब्द निकले, रोहन को होश आया। वह घबरा गया, चेहरा लाल हो गया, तुरंत दूसरे हाथ से अपना मुँह ढँक लिया और बोला, स्वर में शर्म और डर –
“सॉरी डार्लिंग… गलती से निकल गया… मुझे नहीं कहना था… प्लीज़ माफ़ कर दो… मैं… मैं नहीं जानता कैसे निकल गया… तुम्हें बुरा लगा होगा… सॉरी… बहुत सॉरी…”
बंसरी ज़ोर से हँस पड़ी। उसकी हँसी में कोई गुस्सा नहीं, कोई नाराज़गी नहीं – सिर्फ़ शरारत, सिर्फ़ उत्तेजना, सिर्फ़ और ज़्यादा भूख। हँसते हुए उसने गर्दन घुमाकर पीछे देखा, आँखों में शैतानी चमक –
“अरे मेरे अनाड़ी पति… मेरे मूर्ख राजा… चुदाई में जब तक गंदी-गंदी गालियाँ, गंदी-गंदी बातें, गंदी-गंदी शब्द ना हों, तब तक लगता ही नहीं कि मसाला पूरा है… बोलो… जितना मन करे बोलो… जितनी गंदी बात करनी हो करो… मैं तुम्हारी रंडी बीबी हूँ… आज रात सिर्फ़ तुम्हारी छिनाल… तुम्हारी गंदी रंडी… तुम जो बोलोगे, मैं सब सुन लूंगी… सब सह लूंगी… और ज़ोर से चुदूँगी… बोलो… और बोलो… मुझे गाली दो… मुझे रंडी कहो… मुझे अपनी छिनाल कहो… आज मैं तुम्हारी हूँ… पूरी तरह तुम्हारी गंदी रानी…”
यह सुनते ही रोहन के अंदर जोश की नई लहर, नया जुनून दौड़ गया। उसकी आँखों में आग लग गई। उसने दूसरे हाथ की एक उँगली पर भी भरपूर थूक लगाया और दोनों उँगलियों से बंसरी के गांड के छेद को फेरने लगा – घुमाते हुए, दबाते हुए, अंदर जाने की कोशिश करते हुए। फिर उसने दोनों हाथों की दो-दो उँगलियाँ दोनों नितंबों के बीच रखीं और धीरे-धीरे, बहुत संभालकर, उन्हें फैला दिया।
बंसरी की गांड का छेद पूरी तरह खुल गया… गुलाबी, चिकना, सिकुड़ता हुआ और पूरी तरह तैयार।
बंसरी का जीवन 1
बंसरी का जीवन 5
अध्याय 5: २०० लंडों का राज़
बंसरी के गांड के उस गुलाबी, पूरी तरह खुल चुके, सिकुड़ते-फैलते, चमकदार छेद को देखकर रोहन का पूरा दिमाग भन्ना गया। उसकी आँखें उस छोटे-से, कोमल, गुलाबी सुराख पर जमी हुई थीं, जो उसके दोनों हाथों की उँगलियों से फैला हुआ था और हल्का-हल्का साँस ले रहा था जैसे कोई जीवित चीज़ हो। रोहन के मन में एक के बाद एक गंदे, वेश्यावाले, शर्मनाक सवाल जागृत हो गए – जैसे कोई पुराना, नशे वाला, बेकाबू तूफान। कल ही तो शादी हुई थी, आज पहली सुहागरात, और वो अपनी नई-नवेली, भोली-सी दिखने वाली बीवी से इतने गंदे, इतने हरामी सवाल पूछने वाला था? उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, गला सूख रहा था, लंड चूत के अंदर फड़क रहा था, लेकिन बंसरी का वो कोमल, चिकना, पूरी तरह तैयार गांड का छेद देखकर उसकी हिम्मत टूट गई।
पर बंसरी तो शादी से पहले ही बता चुकी थी कि उसने सेक्स किया है – बहुत किया है। और आज रात की चुदाई देखकर तो रोहन को साफ़-साफ़ पता चल गया था कि ये रंडी बीवी अनुभवी है, बहुत ज़्यादा अनुभवी, पेशेवर रंडी जैसी अनुभवी। उसका अंदाज़ा था कि बंसरी के एक नहीं, कई बॉयफ्रेंड्स रहे होंगे, शायद दो या तीन। और जितना सुंदर, जितना कोमल, जितना चिकना ये गांड का छेद है, निश्चित रूप से सैकड़ों मेरे जैसे मोटे-मोटे, गोरे लंड इसको चोद-चोदकर, फाड़-फाड़कर, नोच-नोचकर इस्तेमाल कर चुके होंगे। रोहन असमंजस में था, शर्म से लाल हो रहा था, लेकिन अपने आप पर काबू नहीं रख पाया। उसकी उँगलियाँ अभी भी बंसरी के भरे-भरे, मक्खन जैसे नितंबों को ज़ोर-ज़ोर से फैलाए हुए थीं। उसने गहरी, काँपती साँस ली और पूछ ही बैठा, स्वर में शर्म, डर और उत्तेजना का घिनौना मिश्रण
“मेरी वेश्या बीबी बंसरी… मेरी छिनाल रंडी… सच बता ना रे कुल्टा… इस सुंदर, कोमल, गुलाबी, चिकने गांड के छेद में अब तक कितने-कितने मोटे-मोटे, गंदे लंड घुसे हैं? कितने हरामी मर्दों ने मेरी छिनाल बीवी की गांड मारी है? कितने लंड ने तेरी इस रंडी गांड को फाड़ा है, चौड़ा किया है, रस निकाला है? बोल ना… बोल ना मेरी वेश्या… पूरा सच बोल… मैं सुनना चाहता हूँ… तेरी गांड की पूरी गंदी कहानी…”
बंसरी ने हल्के से अपनी कमर ऊपर-नीचे हिलानी शुरू कर दी। रोहन का लंड अभी भी उसकी गीली, गरम, रसीली चूत के अंदर पूरी तरह घुसा हुआ था। वो धीरे-धीरे, बहुत नाज़ुकता से ऊपर-नीचे होने लगी – लंड को चूत के मुंह से बाहर निकालते हुए, सिर्फ़ सुपाड़ा अंदर रखते हुए, फिर ज़ोरदार झटके से पूरा लंड जड़ तक घुसेड़ते हुए। “पच… पच… पच… पच…” की गीली, चिपचिपाती, कामुक आवाज़ पूरे कमरे में गूँजने लगी। बंसरी ने बड़े प्यार से, शरारत भरी, छिनाल मुस्कान के साथ पीछे मुड़कर रोहन की आँखों में देखा, अपनी आवाज़ को और भी गंदी, और भी भारी, और भी रंडी वाली बनाते हुए बोली –
“अरे मेरे व्यभिचारी पति… मेरे हरामी राजा… मेरे लंड के भूखे गुलाम… तुझे क्या लगता है? तेरी रंडी बीवी बंसरी की गांड के छेद की कितनी बार बजाई होगी इन मर्दों ने? कितने लंड ने मेरी कुल्टा गांड को चोदा होगा? बोल ना… तुझे कितने लगते हैं? तेरी छिनाल बीवी की गांड कितनी बार चुद चुकी है? हाँ… बोल… बोल मेरे व्यभिचारी पति… तेरी रंडी बीवी की गांड की सच्चाई जाननी है ना? जान ले… मैं छुपाऊँगी नहीं… आज रात तेरी छिनाल बीवी सब कुछ खोलकर रख देगी…”
रोहन की साँसें तेज़ हो गईं, सीना ऊपर-नीचे होने लगा। उसने दोनों हाथ बंसरी की कमर, पीठ और भरे-भरे, गद्देदार नितंबों पर फेरने शुरू कर दिए – उन्हें ज़ोर-ज़ोर से दबाते, मलते, हल्के हल्के थपथपाते हुए। लंड अभी भी चूत में था, लेकिन अब वो बोला, स्वर काँपते हुए, उत्तेजना से भरा –
“कुल्टा की गांड के छेद में एक लंड तो गया ही होगा… हाँ ना मेरी रंडी? एक ही हरामी ने तेरी गांड मारी होगी… बोल ना छिनाल… एक ही काफी था ना तेरी इस रंडी गांड के लिए? बोल ना मेरी वेश्या बीवी…”
बंसरी ने अपनी स्पीड बढ़ा दी। अब वो तेज़ी से, ज़ोर-ज़ोर से कमर हिला रही थी, चूत रोहन के लंड को पूरी तरह निचोड़ रही थी, रस बहा रही थी। हँसते हुए, सिसकारते हुए, आँखें बंद करके बोली –
“तुम गलत बोल रहे हो मेरे व्यभिचारी पति… बिल्कुल गलत… एक से कहीं ज़्यादा… बहुत ज़्यादा… मेरी गांड तो लंडों की भूखी है… बोल… और बोल… कितने लगते हैं?”
रोहन उसके नितंबों को ज़ोर-ज़ोर से दबाते हुए, उँगलियाँ गांड के छेद के पास फेरते हुए, दबाते हुए बोला –
“तो दो लड़कों के लंड ने मेरी बीवी की गांड की छेद का मज़ा लिया होगा… दो मोटे, गंदे लंड ने तेरी रंडी गांड को चोदा होगा… बोल ना छिनाल… दो काफी थे ना तेरी गांड के लिए? बोल ना मेरी कुल्टा रंडी…”
बंसरी ने और तेज़ स्पीड पकड़ ली, चूत का गाढ़ा रस रोहन के लंड, अंडकोष और जाँघों पर बहने लगा। ज़ोर से हँसते हुए, सिसकारते हुए बोली –
“ये भी गलत है मेरे हरामी पति… बहुत गलत… दो से कहीं ज़्यादा… मेरी गांड तो कई-कई लंडों की दासी बन चुकी है…”
रोहन अब पूरी तरह उत्तेजित हो गया। उसने बंसरी के नितंबों को फैलाते हुए, गांड का छेद और खोलते हुए कहा –
“पाँच मर्दों से ज़्यादा मर्दों ने मेरी प्यारी बीवी की इस कोमल गांड के छेद को नहीं चोदा होगा… अगर इससे ज़्यादा लोगों ने किया होता तो ये गांड अब तक पूरी तरह खराब, ढीली, फटी हुई, लटकती हुई हो चुकी होती… बोल ना मेरी वेश्या… पाँच से ज़्यादा नहीं ना? बोल ना छिनाल बीवी…”
बंसरी ज़ोर-ज़ोर से हँस पड़ी, उसकी हँसी में शैतानी, उत्तेजना और घमंड था। कमर हिलाते हुए, चूत निचोड़ते हुए बोली –
“ये तो बिल्कुल ही गलत जवाब है मेरे व्यभिचारी राजा… बिल्कुल गलत… पाँच से कहीं ज़्यादा… बहुत ज़्यादा… सैकड़ों…”
यह जवाब सुनकर रोहन थोड़ा आश्चर्य में पड़ गया। उसकी आँखें फैल गईं। उसने जल्दी से अपना एक उँगली मुँह में ली, उस पर बहुत सारा गाढ़ा, गर्म, लार भरा थूक लगाया । फिर बंसरी के गांड के छेद पर रख दिया और धीरे-धीरे, बहुत नाज़ुकता से फेरने लगा – घेरा-घेरा, दबाते हुए, लेकिन अभी अंदर नहीं डाला। उँगली फेरते हुए, स्वर में काँपते हुए पूछा –
“मेरी अप्सरा… मेरी रंडी अप्सरा… मेरी छिनाल बीवी… अब खुद बता ना… कितने लंड लिए हैं तूने इस गांड के छेद में? सच बता… कितने हरामी ने तेरी छिनाल गांड मारी है? कितने लंड ने तेरी रंडी गांड को फाड़ा है? बोल ना… बोल ना मेरी वेश्या…”
बंसरी ने पीछे मुड़कर रोहन की आँखों में गहरी नज़र डाली, अपनी कमर अभी भी तेज़ी से, बिना रुके हिला रही थी। मुस्कुराते हुए, बिना किसी शर्म, किसी झिझक के, पूरी सच्चाई गंदे, भारी स्वर में बोल दी –
“तुम्हारी बीवी ने अभी तक अपने गांड के छेद में २०० से ज़्यादा लंड लिए हैं… हाँ मेरे पति… २०० से भी ज़्यादा… मोटे-मोटे, काले-चिट्टे, छोटे-बड़े, हर तरह के गंदे लंड ने मेरी गांड चोदी है… मेरी चूत में तो ढाई सौ से ज़्यादा लंड घुसे हैं… और मुँह? वो तो मुझे खुद भी याद नहीं… हजारों बार मुँह चुदवाया होगा मैंने… रंडी बनकर… छिनाल बनकर… कुल्टा बनकर… हर रोज़ नई-नई लंडों की भूखी…”
रोहन को लगा जैसे बंसरी मजाक कर रही है। वो हँसते हुए, उँगलियाँ अभी भी गांड के छेद पर फेरते हुए, दबाते हुए बोला –
“अरे छिनाल… तू क्या होटल में जा-जाकर सर्विस देती थी क्या? क्या पोर्न फिल्मों में काम किया था जिसके कारण इतने सारे मर्दों को तेरी गांड के छेद का दीवाना बना दिया? बोल ना मेरी कुल्टा रंडी… सच बोल… २००? हाहाहा… मजाक तो नहीं कर रही ना मेरी वेश्या बीवी? इतनी बड़ी रंडी है मेरी बीवी?”
बंसरी हँसी, लेकिन उसकी आँखों में सच्चाई की चिंगारी थी। रोहन ने फिर दोनों हाथों की दो-दो उँगलियाँ गांड के छेद के पास ले जाकर हल्का-सा खोलते हुए, फैलाते हुए पूछा –
“मेरी संस्कारी बीवी के इस कोमल और सुंदर गांड के छेद में अब तक सबसे बड़ा, सबसे मोटा और किस रंग का लंड गया है? बोल ना छिनाल… किस हरामी का सबसे मोटा, सबसे काला लंड तेरी गांड में घुसा है? बोल ना मेरी रंडी… पूरा सच बोल…”
बंसरी ने अपनी कमर हिलाते हुए, रोहन की तरफ देखते हुए, सिसकारते हुए कहा –
“क्या मेरा धर्म पति सच्चाई सुनने के लिए तैयार है? सच सुन लेगा ना… बिना घबराए? बिना रुक जाए? बोल ना मेरे व्यभिचारी पति…”
रोहन ने आँख मारते हुए, मजाक को और बढ़ाते हुए, उत्तेजना से काँपते स्वर में कहा –
“इतनी सुंदर धर्म पत्नी अगर कई मर्दों को पहले संतुष्ट कर चुकी हो तो पति तो यही चाहेगा ना… कि उसकी बीवी शादी से पहले भी कई लंड चूस-चूसकर, गांड चुदवा-चुदवाकर, चूत निचोड़-निचोड़कर सीख चुकी हो… ताकि अब मुझे अच्छे से, पूरी तरह संतुष्ट कर सके… मैं भी ख्वाहिश से अछूता नहीं हूँ मेरी रंडी… मैं भी जानना चाहता हूँ कि मेरी बीवी की गांड की गहराई कितने बड़े लंड से नापी गई है… उसकी गांड की दीवारों को कितने मोटे लंड ने चोद के चोड़ा किया है… और किस रंग का था वो लंड… बोल ना छिनाल… बोल ना मेरी वेश्या… पूरा गंदा सच बोल…”
बंसरी पिछले १० मिनट से लगातार, बिना थके कमर हिला रही थी। रोहन को पता भी नहीं चला कि वो इतने समय से चुद रहा है। बंसरी के अनुभव और दवा के असर से वो अभी तक नहीं झड़ा था। अब बारी थी परम आनंद की। बंसरी ने रोहन के हाथों को अपने ऊपर से हटाया, कमर हिलाते हुए ही सीधा काउगर्ल पोजीशन में आ गई। अब वो सामने थी, ३२ इंच के भरे-भरे स्तन झूल रहे थे, निप्पल सख्त और गुलाबी। स्पीड बढ़ाते हुए, एक हाथ का फोरआर्म रोहन को दिखाते हुए, आँखों में शैतानी भरकर बोली –
“इस फोरआर्म के बराबर के… और लगभग इसी के बराबर के मोटे… और ब्लैक मॉम्बा की तरह भुजंग, काले लंड… ने तुम्हारी संस्कारी धर्म पत्नी के गांड के छेद का स्वाद लिया है… हाँ मेरे व्यभिचारी पति… ऐसे काले अजगर लंडों ने मेरी गांड फाड़ी है…”
रोहन को लगा बंसरी मजाक कर रही है। वो हँसते हुए, उसके स्तनों को दबाते हुए बोला –
“इस लंड को तू लंड कह रही है? इस लंड को लंड कहना इसका अपमान है रंडी… इसे तो भारत के हिसाब से अजगर कहना ठीक रहेगा… एक काला अजगर ने मेरी बीवी की पूरी गांड की अंदर की गहराई नाप ली… मेरी वेश्या बंसरी की गांड की दीवारों को पूरी तरह चौड़ा कर दिया… बोल ना छिनाल… सच बोल… कितना मजा आया था?”
बंसरी ने स्पीड बरकरार रखते हुए, रोहन की छाती पर हाथ रखकर, कमर हिलाते हुए कहा –
“तुम गलत सोच रहे हो मेरे हरामी पति… तुमने मेरी बात का गलत मतलब निकाला है… एक नहीं… दो लंड थे… दो काले अजगर… दोनों मर्द अफ्रीका महाद्वीप के थे मेरे व्यभिचारी पति… दिखने में चेहरों में थोड़ा अंतर था, लेकिन दोनों कोयले जैसे बिल्कुल काले… उनके लंड तो उससे भी ज़्यादा काले थे… शरीर एक समान – हाइट, बॉडी, सब… और लंड? बिल्कुल एक जैसे… फोरआर्म जितने मोटे, भुजंग जैसे लंबे, नसें फटी हुई… जब एक बार में एक मर्द मेरी गांड मारता था, तो लंड को अधिकतम सीमा तक घुसेड़ देता… दूसरा भी यही करता… दोनों लगातार मेरी गांड की गहराई की सीमा पार करने की कोशिश कर रहे थे… कोई किसी को हरा नहीं पा रहा था… वो मेरी गांड की अब तक की सबसे ज़्यादा चुदाई की गहराई की सीमा थी… लेकिन जब दोनों ने एक साथ… अपने दोनों काले अजगर लंड मेरी गांड के छेद में घुसाए… तब पिछली बार की सीमा से वह दोनों बहुत पीछे रह गए थे… लेकिन मेरी गांड की दीवारें इतनी चौड़ी हो गईं कि उसमें से क्रिकेट की गेंद भी आराम से निकल जाती… हाँ मेरे पति… दो काले मोटे लंड एक साथ मेरी गांड में… और मैं चीख-चीखकर, गिड़गिड़ाकर चुद रही थी… रंडी बनकर… छिनाल बनकर… ‘और चोदो… और गहरी… फाड़ दो मेरी गांड…’ चिल्ला रही थी… पूरा रस निकल आया था… एक घंटे तक चुदाई चली थी… और मैं फिर भी और माँग रही थी…”
इसी तरह गंदी-गंदी, वेश्यावाली बातें करते हुए, चुदाई करते हुए, स्तनों को चूसते हुए, नितंबों को दबाते हुए, उँगलियाँ गांड पर रगड़ते हुए… और १० मिनट बीत गए। रोहन का शरीर अचानक काँपने लगा, आँखें उलट गईं। उसने जल्दी से बंसरी को अपनी तरफ खींचा, उसे कसकर जकड़ लिया, छातियाँ पूरी तरह दब गईं, होंठों पर गहरा, लार बहाता किस किया और तेज़-तेज़, काँपती साँसों के साथ झड़ने लगा। पूरा गाढ़ा, गर्म, सफेद रस कंडोम में भरने लगा, लंड फड़क-फड़ककर खाली हो रहा था। बंसरी भी उसके साथ काँप रही थी, मुस्कुराते हुए उसके कान में फुसफुसाई –
“झड़ जा मेरे व्यभिचारी पति… अपनी रंडी बीवी की गांड की पूरी गंदी कहानी सुनकर झड़ जा… मैं तेरी छिनाल हूँ… तेरी कुल्टा हूँ… तेरी वेश्या हूँ… हमेशा तेरी… और भी गंदी कहानियाँ सुननी हैं तो बोल… मैं सब बताऊँगी… रात अभी बाकी है मेरे हरामी राजा…”
रोहन की आँखें बंद हो गईं, शरीर थरथरा रहा था, साँसें फूल रही थीं… दूसरा राउंड पूरा हो चुका था, और अभी रात बहुत लंबी थी।
बंसरी के गांड के उस गुलाबी, पूरी तरह खुल चुके, सिकुड़ते-फैलते, चमकदार छेद को देखकर रोहन का पूरा दिमाग भन्ना गया। उसकी आँखें उस छोटे-से, कोमल, गुलाबी सुराख पर जमी हुई थीं, जो उसके दोनों हाथों की उँगलियों से फैला हुआ था और हल्का-हल्का साँस ले रहा था जैसे कोई जीवित चीज़ हो। रोहन के मन में एक के बाद एक गंदे, वेश्यावाले, शर्मनाक सवाल जागृत हो गए – जैसे कोई पुराना, नशे वाला, बेकाबू तूफान। कल ही तो शादी हुई थी, आज पहली सुहागरात, और वो अपनी नई-नवेली, भोली-सी दिखने वाली बीवी से इतने गंदे, इतने हरामी सवाल पूछने वाला था? उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, गला सूख रहा था, लंड चूत के अंदर फड़क रहा था, लेकिन बंसरी का वो कोमल, चिकना, पूरी तरह तैयार गांड का छेद देखकर उसकी हिम्मत टूट गई।
पर बंसरी तो शादी से पहले ही बता चुकी थी कि उसने सेक्स किया है – बहुत किया है। और आज रात की चुदाई देखकर तो रोहन को साफ़-साफ़ पता चल गया था कि ये रंडी बीवी अनुभवी है, बहुत ज़्यादा अनुभवी, पेशेवर रंडी जैसी अनुभवी। उसका अंदाज़ा था कि बंसरी के एक नहीं, कई बॉयफ्रेंड्स रहे होंगे, शायद दो या तीन। और जितना सुंदर, जितना कोमल, जितना चिकना ये गांड का छेद है, निश्चित रूप से सैकड़ों मेरे जैसे मोटे-मोटे, गोरे लंड इसको चोद-चोदकर, फाड़-फाड़कर, नोच-नोचकर इस्तेमाल कर चुके होंगे। रोहन असमंजस में था, शर्म से लाल हो रहा था, लेकिन अपने आप पर काबू नहीं रख पाया। उसकी उँगलियाँ अभी भी बंसरी के भरे-भरे, मक्खन जैसे नितंबों को ज़ोर-ज़ोर से फैलाए हुए थीं। उसने गहरी, काँपती साँस ली और पूछ ही बैठा, स्वर में शर्म, डर और उत्तेजना का घिनौना मिश्रण
“मेरी वेश्या बीबी बंसरी… मेरी छिनाल रंडी… सच बता ना रे कुल्टा… इस सुंदर, कोमल, गुलाबी, चिकने गांड के छेद में अब तक कितने-कितने मोटे-मोटे, गंदे लंड घुसे हैं? कितने हरामी मर्दों ने मेरी छिनाल बीवी की गांड मारी है? कितने लंड ने तेरी इस रंडी गांड को फाड़ा है, चौड़ा किया है, रस निकाला है? बोल ना… बोल ना मेरी वेश्या… पूरा सच बोल… मैं सुनना चाहता हूँ… तेरी गांड की पूरी गंदी कहानी…”
बंसरी ने हल्के से अपनी कमर ऊपर-नीचे हिलानी शुरू कर दी। रोहन का लंड अभी भी उसकी गीली, गरम, रसीली चूत के अंदर पूरी तरह घुसा हुआ था। वो धीरे-धीरे, बहुत नाज़ुकता से ऊपर-नीचे होने लगी – लंड को चूत के मुंह से बाहर निकालते हुए, सिर्फ़ सुपाड़ा अंदर रखते हुए, फिर ज़ोरदार झटके से पूरा लंड जड़ तक घुसेड़ते हुए। “पच… पच… पच… पच…” की गीली, चिपचिपाती, कामुक आवाज़ पूरे कमरे में गूँजने लगी। बंसरी ने बड़े प्यार से, शरारत भरी, छिनाल मुस्कान के साथ पीछे मुड़कर रोहन की आँखों में देखा, अपनी आवाज़ को और भी गंदी, और भी भारी, और भी रंडी वाली बनाते हुए बोली –
“अरे मेरे व्यभिचारी पति… मेरे हरामी राजा… मेरे लंड के भूखे गुलाम… तुझे क्या लगता है? तेरी रंडी बीवी बंसरी की गांड के छेद की कितनी बार बजाई होगी इन मर्दों ने? कितने लंड ने मेरी कुल्टा गांड को चोदा होगा? बोल ना… तुझे कितने लगते हैं? तेरी छिनाल बीवी की गांड कितनी बार चुद चुकी है? हाँ… बोल… बोल मेरे व्यभिचारी पति… तेरी रंडी बीवी की गांड की सच्चाई जाननी है ना? जान ले… मैं छुपाऊँगी नहीं… आज रात तेरी छिनाल बीवी सब कुछ खोलकर रख देगी…”
रोहन की साँसें तेज़ हो गईं, सीना ऊपर-नीचे होने लगा। उसने दोनों हाथ बंसरी की कमर, पीठ और भरे-भरे, गद्देदार नितंबों पर फेरने शुरू कर दिए – उन्हें ज़ोर-ज़ोर से दबाते, मलते, हल्के हल्के थपथपाते हुए। लंड अभी भी चूत में था, लेकिन अब वो बोला, स्वर काँपते हुए, उत्तेजना से भरा –
“कुल्टा की गांड के छेद में एक लंड तो गया ही होगा… हाँ ना मेरी रंडी? एक ही हरामी ने तेरी गांड मारी होगी… बोल ना छिनाल… एक ही काफी था ना तेरी इस रंडी गांड के लिए? बोल ना मेरी वेश्या बीवी…”
बंसरी ने अपनी स्पीड बढ़ा दी। अब वो तेज़ी से, ज़ोर-ज़ोर से कमर हिला रही थी, चूत रोहन के लंड को पूरी तरह निचोड़ रही थी, रस बहा रही थी। हँसते हुए, सिसकारते हुए, आँखें बंद करके बोली –
“तुम गलत बोल रहे हो मेरे व्यभिचारी पति… बिल्कुल गलत… एक से कहीं ज़्यादा… बहुत ज़्यादा… मेरी गांड तो लंडों की भूखी है… बोल… और बोल… कितने लगते हैं?”
रोहन उसके नितंबों को ज़ोर-ज़ोर से दबाते हुए, उँगलियाँ गांड के छेद के पास फेरते हुए, दबाते हुए बोला –
“तो दो लड़कों के लंड ने मेरी बीवी की गांड की छेद का मज़ा लिया होगा… दो मोटे, गंदे लंड ने तेरी रंडी गांड को चोदा होगा… बोल ना छिनाल… दो काफी थे ना तेरी गांड के लिए? बोल ना मेरी कुल्टा रंडी…”
बंसरी ने और तेज़ स्पीड पकड़ ली, चूत का गाढ़ा रस रोहन के लंड, अंडकोष और जाँघों पर बहने लगा। ज़ोर से हँसते हुए, सिसकारते हुए बोली –
“ये भी गलत है मेरे हरामी पति… बहुत गलत… दो से कहीं ज़्यादा… मेरी गांड तो कई-कई लंडों की दासी बन चुकी है…”
रोहन अब पूरी तरह उत्तेजित हो गया। उसने बंसरी के नितंबों को फैलाते हुए, गांड का छेद और खोलते हुए कहा –
“पाँच मर्दों से ज़्यादा मर्दों ने मेरी प्यारी बीवी की इस कोमल गांड के छेद को नहीं चोदा होगा… अगर इससे ज़्यादा लोगों ने किया होता तो ये गांड अब तक पूरी तरह खराब, ढीली, फटी हुई, लटकती हुई हो चुकी होती… बोल ना मेरी वेश्या… पाँच से ज़्यादा नहीं ना? बोल ना छिनाल बीवी…”
बंसरी ज़ोर-ज़ोर से हँस पड़ी, उसकी हँसी में शैतानी, उत्तेजना और घमंड था। कमर हिलाते हुए, चूत निचोड़ते हुए बोली –
“ये तो बिल्कुल ही गलत जवाब है मेरे व्यभिचारी राजा… बिल्कुल गलत… पाँच से कहीं ज़्यादा… बहुत ज़्यादा… सैकड़ों…”
यह जवाब सुनकर रोहन थोड़ा आश्चर्य में पड़ गया। उसकी आँखें फैल गईं। उसने जल्दी से अपना एक उँगली मुँह में ली, उस पर बहुत सारा गाढ़ा, गर्म, लार भरा थूक लगाया । फिर बंसरी के गांड के छेद पर रख दिया और धीरे-धीरे, बहुत नाज़ुकता से फेरने लगा – घेरा-घेरा, दबाते हुए, लेकिन अभी अंदर नहीं डाला। उँगली फेरते हुए, स्वर में काँपते हुए पूछा –
“मेरी अप्सरा… मेरी रंडी अप्सरा… मेरी छिनाल बीवी… अब खुद बता ना… कितने लंड लिए हैं तूने इस गांड के छेद में? सच बता… कितने हरामी ने तेरी छिनाल गांड मारी है? कितने लंड ने तेरी रंडी गांड को फाड़ा है? बोल ना… बोल ना मेरी वेश्या…”
बंसरी ने पीछे मुड़कर रोहन की आँखों में गहरी नज़र डाली, अपनी कमर अभी भी तेज़ी से, बिना रुके हिला रही थी। मुस्कुराते हुए, बिना किसी शर्म, किसी झिझक के, पूरी सच्चाई गंदे, भारी स्वर में बोल दी –
“तुम्हारी बीवी ने अभी तक अपने गांड के छेद में २०० से ज़्यादा लंड लिए हैं… हाँ मेरे पति… २०० से भी ज़्यादा… मोटे-मोटे, काले-चिट्टे, छोटे-बड़े, हर तरह के गंदे लंड ने मेरी गांड चोदी है… मेरी चूत में तो ढाई सौ से ज़्यादा लंड घुसे हैं… और मुँह? वो तो मुझे खुद भी याद नहीं… हजारों बार मुँह चुदवाया होगा मैंने… रंडी बनकर… छिनाल बनकर… कुल्टा बनकर… हर रोज़ नई-नई लंडों की भूखी…”
रोहन को लगा जैसे बंसरी मजाक कर रही है। वो हँसते हुए, उँगलियाँ अभी भी गांड के छेद पर फेरते हुए, दबाते हुए बोला –
“अरे छिनाल… तू क्या होटल में जा-जाकर सर्विस देती थी क्या? क्या पोर्न फिल्मों में काम किया था जिसके कारण इतने सारे मर्दों को तेरी गांड के छेद का दीवाना बना दिया? बोल ना मेरी कुल्टा रंडी… सच बोल… २००? हाहाहा… मजाक तो नहीं कर रही ना मेरी वेश्या बीवी? इतनी बड़ी रंडी है मेरी बीवी?”
बंसरी हँसी, लेकिन उसकी आँखों में सच्चाई की चिंगारी थी। रोहन ने फिर दोनों हाथों की दो-दो उँगलियाँ गांड के छेद के पास ले जाकर हल्का-सा खोलते हुए, फैलाते हुए पूछा –
“मेरी संस्कारी बीवी के इस कोमल और सुंदर गांड के छेद में अब तक सबसे बड़ा, सबसे मोटा और किस रंग का लंड गया है? बोल ना छिनाल… किस हरामी का सबसे मोटा, सबसे काला लंड तेरी गांड में घुसा है? बोल ना मेरी रंडी… पूरा सच बोल…”
बंसरी ने अपनी कमर हिलाते हुए, रोहन की तरफ देखते हुए, सिसकारते हुए कहा –
“क्या मेरा धर्म पति सच्चाई सुनने के लिए तैयार है? सच सुन लेगा ना… बिना घबराए? बिना रुक जाए? बोल ना मेरे व्यभिचारी पति…”
रोहन ने आँख मारते हुए, मजाक को और बढ़ाते हुए, उत्तेजना से काँपते स्वर में कहा –
“इतनी सुंदर धर्म पत्नी अगर कई मर्दों को पहले संतुष्ट कर चुकी हो तो पति तो यही चाहेगा ना… कि उसकी बीवी शादी से पहले भी कई लंड चूस-चूसकर, गांड चुदवा-चुदवाकर, चूत निचोड़-निचोड़कर सीख चुकी हो… ताकि अब मुझे अच्छे से, पूरी तरह संतुष्ट कर सके… मैं भी ख्वाहिश से अछूता नहीं हूँ मेरी रंडी… मैं भी जानना चाहता हूँ कि मेरी बीवी की गांड की गहराई कितने बड़े लंड से नापी गई है… उसकी गांड की दीवारों को कितने मोटे लंड ने चोद के चोड़ा किया है… और किस रंग का था वो लंड… बोल ना छिनाल… बोल ना मेरी वेश्या… पूरा गंदा सच बोल…”
बंसरी पिछले १० मिनट से लगातार, बिना थके कमर हिला रही थी। रोहन को पता भी नहीं चला कि वो इतने समय से चुद रहा है। बंसरी के अनुभव और दवा के असर से वो अभी तक नहीं झड़ा था। अब बारी थी परम आनंद की। बंसरी ने रोहन के हाथों को अपने ऊपर से हटाया, कमर हिलाते हुए ही सीधा काउगर्ल पोजीशन में आ गई। अब वो सामने थी, ३२ इंच के भरे-भरे स्तन झूल रहे थे, निप्पल सख्त और गुलाबी। स्पीड बढ़ाते हुए, एक हाथ का फोरआर्म रोहन को दिखाते हुए, आँखों में शैतानी भरकर बोली –
“इस फोरआर्म के बराबर के… और लगभग इसी के बराबर के मोटे… और ब्लैक मॉम्बा की तरह भुजंग, काले लंड… ने तुम्हारी संस्कारी धर्म पत्नी के गांड के छेद का स्वाद लिया है… हाँ मेरे व्यभिचारी पति… ऐसे काले अजगर लंडों ने मेरी गांड फाड़ी है…”
रोहन को लगा बंसरी मजाक कर रही है। वो हँसते हुए, उसके स्तनों को दबाते हुए बोला –
“इस लंड को तू लंड कह रही है? इस लंड को लंड कहना इसका अपमान है रंडी… इसे तो भारत के हिसाब से अजगर कहना ठीक रहेगा… एक काला अजगर ने मेरी बीवी की पूरी गांड की अंदर की गहराई नाप ली… मेरी वेश्या बंसरी की गांड की दीवारों को पूरी तरह चौड़ा कर दिया… बोल ना छिनाल… सच बोल… कितना मजा आया था?”
बंसरी ने स्पीड बरकरार रखते हुए, रोहन की छाती पर हाथ रखकर, कमर हिलाते हुए कहा –
“तुम गलत सोच रहे हो मेरे हरामी पति… तुमने मेरी बात का गलत मतलब निकाला है… एक नहीं… दो लंड थे… दो काले अजगर… दोनों मर्द अफ्रीका महाद्वीप के थे मेरे व्यभिचारी पति… दिखने में चेहरों में थोड़ा अंतर था, लेकिन दोनों कोयले जैसे बिल्कुल काले… उनके लंड तो उससे भी ज़्यादा काले थे… शरीर एक समान – हाइट, बॉडी, सब… और लंड? बिल्कुल एक जैसे… फोरआर्म जितने मोटे, भुजंग जैसे लंबे, नसें फटी हुई… जब एक बार में एक मर्द मेरी गांड मारता था, तो लंड को अधिकतम सीमा तक घुसेड़ देता… दूसरा भी यही करता… दोनों लगातार मेरी गांड की गहराई की सीमा पार करने की कोशिश कर रहे थे… कोई किसी को हरा नहीं पा रहा था… वो मेरी गांड की अब तक की सबसे ज़्यादा चुदाई की गहराई की सीमा थी… लेकिन जब दोनों ने एक साथ… अपने दोनों काले अजगर लंड मेरी गांड के छेद में घुसाए… तब पिछली बार की सीमा से वह दोनों बहुत पीछे रह गए थे… लेकिन मेरी गांड की दीवारें इतनी चौड़ी हो गईं कि उसमें से क्रिकेट की गेंद भी आराम से निकल जाती… हाँ मेरे पति… दो काले मोटे लंड एक साथ मेरी गांड में… और मैं चीख-चीखकर, गिड़गिड़ाकर चुद रही थी… रंडी बनकर… छिनाल बनकर… ‘और चोदो… और गहरी… फाड़ दो मेरी गांड…’ चिल्ला रही थी… पूरा रस निकल आया था… एक घंटे तक चुदाई चली थी… और मैं फिर भी और माँग रही थी…”
इसी तरह गंदी-गंदी, वेश्यावाली बातें करते हुए, चुदाई करते हुए, स्तनों को चूसते हुए, नितंबों को दबाते हुए, उँगलियाँ गांड पर रगड़ते हुए… और १० मिनट बीत गए। रोहन का शरीर अचानक काँपने लगा, आँखें उलट गईं। उसने जल्दी से बंसरी को अपनी तरफ खींचा, उसे कसकर जकड़ लिया, छातियाँ पूरी तरह दब गईं, होंठों पर गहरा, लार बहाता किस किया और तेज़-तेज़, काँपती साँसों के साथ झड़ने लगा। पूरा गाढ़ा, गर्म, सफेद रस कंडोम में भरने लगा, लंड फड़क-फड़ककर खाली हो रहा था। बंसरी भी उसके साथ काँप रही थी, मुस्कुराते हुए उसके कान में फुसफुसाई –
“झड़ जा मेरे व्यभिचारी पति… अपनी रंडी बीवी की गांड की पूरी गंदी कहानी सुनकर झड़ जा… मैं तेरी छिनाल हूँ… तेरी कुल्टा हूँ… तेरी वेश्या हूँ… हमेशा तेरी… और भी गंदी कहानियाँ सुननी हैं तो बोल… मैं सब बताऊँगी… रात अभी बाकी है मेरे हरामी राजा…”
रोहन की आँखें बंद हो गईं, शरीर थरथरा रहा था, साँसें फूल रही थीं… दूसरा राउंड पूरा हो चुका था, और अभी रात बहुत लंबी थी।